ज़िन्दगी को कभी सोच समझ कर जीने वाला, बिन परवाह के जिए तो क्या होगा?
बग़ैर उम्मीद के कोई किसी का इंतज़ार करे तो क्या होगा?
सारी बाते बे मक़सद साबित होती है, अगर उसका वजूद निकाल दिया जाए तो।
बात उसके दिल की थी, वो रोना तो चाहता था लेकिन आंसू आने में शरमा रहे थे। खुश देखा जब उसे निकाह नामे पर दस्तख़त करते, बे मौत मारा गया दिल बेचारा,
जिसे वहम उसका खुद के होने का था।
वो किसी और का होता हुआ देखता रहा उसे...
सीने में एक अजीब सी बेचैनी लिए,
उसे शहर की गलियों में भटकता हुआ देखा गया,
एक उम्मीद से भरी झोली जब उसके सामने रखी गई,
उसे देने को तो बहुत कुछ था, पर उससे उसकी मोहब्बत पगड़ी के बदले मांगी गई।
वो मुकम्मल भुला कैसे सकता था, आख़िर वर्षों का प्यार था।
फिर भी लोगों की उम्मीदों का पूरा ख़्याल रखा,
जब ख्वाहिशें खत्म हो जाती और खोने को कुछ नहीं होता,
फिर ज़िंदगी का मोल भी नहीं होता,
अब ये बात उसे समझ आई। फिर बंद कमरे से निर्वात का एक शोर उठा...
वो हो के तन्हा, आलम-ए- बरज़ख में जा बैठा।

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