उम्मीदें बहुत हैं बसती इस दिल में,
इन खुली जुल्फों का साया भी कभी हमारा होगा...
क़मर(चांद) हो तुम शबनमी रातों का, पासबाँ(चौकीदार) मैं तुम्हारा।
अहद(पक्का) है इन अय्यार(छल) रातों की...
एक शाम होगी, और फिर होगा दीदार तुम्हारा...
क़ल्ब- ए - अलम(दिल का दुःख) हरगिज़ न था,
जब तसव्वुर में थे तुम, अब तलब तेरी रूह की है...
उम्मीदें बहुत हैं बसती इस दिल में,
इन खुली जुल्फों का साया भी कभी हमारा होगा...
जो जान पड़े हैं, हक़ीक़त में मोहब्बत...
उन्हें भला, किसी से क्या शिकायत होगा।
वो कहते है, रखें यक़ीन वादों पर... अगरचें
उन वादों का भ्रम ही क्या रखना? जो वा'दा-ए -फ़र्दा हों।
उम्मीदें बहुत हैं बसती इस दिल में,
इन खुली जुल्फों का साया भी कभी हमारा होगा।
उसकी बातों का असर जब मुझपे होगा,
हां, मैं कह सकता हूँ, मुझे मोहब्बत उससे दुबारा होगा।
वो कह के गई है मिलने को हश्र में....
ख़ुदा जाने...
हश्र में, न जाने "मेरा हश्र" क्या होगा।
उम्मीदें बहुत हैं बसती इस दिल में,
इन खुली जुल्फों का साया भी कभी हमारा होगा।

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