तुम थी जब
तुम ख्वाब थी
मेरा तुझसे मिलने तक,
आज कैसे हकीकत से
पस्त हुआ हूँ मैं...
तुम आबो हवा थी
मेरे अकेलेपन में,
आज महफिलों में भी तन्हा हुआ हूँ मैं..
ख़लिश बनी हुई थी जो दरमियाँ
उसे ख़त्म थोड़ी तुम किये होते, थोडा हम..
अब लबों को ज़रा खोल लो, और ये चुप्पी थोड़ी तोड़ दो
मेरा गला न भर आये
तुम अपनी आखों से ही कुछ बोल दो...

0 टिप्पणियाँ