मैं देखता था उसके साथ मैदान-ए-हश्र के ख़्वाब...

 


मैं देखता था उसके साथ मैदान-ए-हश्र के ख़्वाब...

फिर उसका निक़ाह हुआ,

 और उसकी मोहब्बत मुझपे हराम हो गयी।

वो मशगूल अपने शौहर में, 

मैं अनजान उसकी मोहब्बत से...

दुआओं में ख़ुदा से दरयाफ़्त करता, 

आख़िरत में उसको मेरे साथ रखना।

ये महज़ एक उम्र का वहम था, 

फिर उम्रें गुजरती गयी....

और जो कभी दिलों जॉन छिड़का करते थे, 

जरूरतों ने उनको गैर-ए-हबीब बना दिया।

अब वो बातें बेमोल लगती है, 

जी कभी अफ़ज़ल हुआ करती थीं...

अब मैन ख़्वाब देखना छोड़ दिया, 

जज़्बात में बहना छोड़ दिया।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ