विद्यालय,अभिभावक और शोषण

सर्व शिक्षा अभियान , सब पढ़े सब बढ़े इत्यादि स्लोगन सिर्फ अखबारों और टीवी चैनलों तक ही सीमित है|
जमीनी हक़ीक़त कुछ और ही बयान करती है|
                                                  


स्कूल दुबारा खुलने लगे है और इधर बरसात भी शुरू हो चुकी है, कुछ बच्चे स्कूल जाने लगे हैं तो कुछ अपनी किताब -कॉपी के इंतजार में है की जब नई आएगी तब से जाना शुरू करेंगे| 
इनके मन मे नई किताब के साथ नई कॉपी जरूरी है| वाली मानसिकता भरी होती है| हो भी क्यों न सभी बच्चे जो लेकर आते है| 
ये नई कॉपी, नई किताब की चिंता पिता की नींद, आँखों से छीन लेता है, मजदूर वर्ग की तो और भी जब बारिश शुरू हो जाती है और काम सारे बंद पड़ जाते है| उस वक़्त घर चलाना ही मुश्किल हो जाता है, तो किताब-कॉपी स्कूल फीस की बातें करनी बेमानी है|

आर्थिक रूप से सक्षम परिवार की तो कोई बात नहीं किन्तु आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का क्या?
बात करें किसान, मजदूर , या प्राइवेट सेक्टर मे कार्यरत लोगों की तो उनकी इतनी क्षमता नहीं होती की वो बड़े प्राइवेट स्कूल मे अपने बच्चों का दाखिला करा पाएं|
अगर बात करें उन लोगों की जो अपना परिवार, गाँव या अपने शहर से कहीं दूसरे शहर लेकर रहते हो तो उनकी दिक्कतें और ज्यादा होती है|
गाँव छोड़ शहर आए की कुछ पैसा कमा के बचा लेंगे और साथ-ही साथ बच्चों की अच्छी शिक्षा भी हो जाएगी|
किन्तु उनकी इस सोच पर पानी फेरने को सभी प्राइवेट स्कूल तैयार बैठे हैं |

आइए इनके द्वारा अभिभावकों को शोषित किए जाने के तरीकों पर चर्चा करते है-
  • जब ग्रामीण क्षेत्रों से लोग अपने बच्चों को अच्छी  शिक्षा दिलाने जाते है तो, माता -पिता की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगा कर addmission  लेने से इनकार कर दिया जाता है| 
  •  addmission  के नाम पर आभिभावकों  से मोटी रकम वसूली जाती  है|
  • साथ ही साथ कंप्युटर लैब, मासिक परीक्षा, स्मार्ट क्लास ऐसे ही न जाने कितने तरह के एक्स्ट्रा शुल्क लिए जाते है|
  • हर साल सभी कक्षाओं के किताब की publication  बदल दी जाती है| बुक सेलर से इनकी एक परसेंटेज (%) तय हो जाती है, ये % किताब के मूल्य की 50% या 60% तक होती है|
  • हर साल फीस मे बढ़ोतरी होती है किन्तु अध्यापक के तनख्वाह में नहीं|
  • बच्चों की सुरक्षा को अनदेखा किया जाता है|
  • एक ही वैन  मे 20-25 बच्चे ठूस दिए जाते है|
  • समय समय पर तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित कर बच्चों से मोटी रकम वसूल की जाती है|
  • हर 2-3 साल पर बच्चों का यूनिफॉर्म बदल दिया जाता है, यहाँ तक की यूनिफ़ॉर्म मे भी कमीशन तय रहता है|
            और न जाने कितने ना-ना प्रकार के हथकंडे संस्थाओं द्वारा अपनाए जाते है| अगर आप का बच्चा/बच्ची होंगे तो आप खुद भुक्त-भोगी हुए होंगे|

 प्राइवेट विद्यालयों से ग़ायब होते सांस्कृतिक कार्यक्रम-
एक समय था जब स्कूल से गौरवान्वित करने वाले कार्यक्रम होते थे| किन्तु आज दिवाली हो या होली बस स्कूल वालों को बच्चों की अच्छी फोटो चाहिए जो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने योग्य हो|
महापुरुषों के जन्मदिवस हो या बलिदान दिवस बच्चों को उनके बारे मे कोई जानकारी ही नहीं दी जा रही|
इससे ज्यादा शर्म की बात तो ये है की अपने राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस व गणतन्त्र दिवस के अवसर पर रैली के नाम पर बच्चों को सड़कों पर नचाया जा रहा है| और आगे अपने स्कूल का बैनर लिए दो बच्चे दिक्कतों  सामना करने हुए सोचते होंगे, अगर इस लिए आजाद हुए हम तो गुलामी ही बेहतर थी| 
                                            
                                             स्रोत-गूगल इमेज 

  बच्चों मे अपने ऐतिहासिक जानकारियों का अभाव आने वाले सालों मे आप खुद देखेंगे|
विद्यालय ही एक ऐसा स्थान है छात्र जीवन में, जहां से देशभक्ति, देशहीत, सत्यनिष्ठा, जैसी भावनाओं का जन्म होता है|
आज भी जब राष्ट्रगान विद्यालय परिसर मे होता है तो हम सभी के हृदय मे देशभक्ति की भावना उत्पन्न होने से हमारे रोंगटे खड़े हो जाते है|

अब रही बात विद्यालय हित  की तो आप अच्छी शिक्षा देने का प्रयास करें, शिक्षा को व्यवसाय नहीं बनायें|
आज भी कुछ गिने चुने विद्यालय है जिनका अभिभावक तरिफ़ करते नहीं थकते|


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