सरकार Vs न्यायपालिका ऑन कोलेजियम
(Government Vs Judiciary on Collegium)
वर्तमान में कोलेजियम पर बयान बाजी का सिलसिला उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूर्ण के नियुक्त हो जाने के बाद से अधिक चर्चा में है|
हालांकि कोलेजियम पर बयान बाजी बहुत समय पहले से होती आ रही है, वर्तमान मे उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा 26 नवंबर संविधान दिवस के कार्यक्रम मे संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)को न्यायपालिका द्वारा 2015 मे रद्द किए जाने से संबंधित व्यक्तव्य रखे-
उन्होंने कहा की संसद द्वारा पारित कानून (NJAC) जो लोगों की इच्छा को दर्शाता है (संसद) उसे उच्चतम न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया जाता है और दुनिया को ऐसे किसी कदम के बारे मे कोई जानकारी ही नहीं है|
और NJAC अधिनियम रद्द किए जाने संबंधित संसद मे कोई चर्चा भी नहीं हुई, यह एक "बहुत गंभीर" मसला है|
फिर 02/12/2022 को एल. एम. सिंधवी स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने संविधान की प्रस्तावना मे "हम भारत के लोग" रेखांकित करते हुए उल्लेख किया की संसद लोगों की इच्छा को व्यक्त करती है| भारत के लोगों की इच्छा को एक संवैधानिक प्रावधान मे बदल दिया गया, जो की एक वैध मंच (संसद) द्वारा व्यक्त की गई थी| यहाँ भी उपराष्ट्रपति का संकेत NJAC रद्द किए जाने संबंधित रोष को दर्शाता है ) राज्यसभा में सभापति के रूप में कार्यभार संभालते हुए भी उपराष्ट्रपति द्वारा इसी संदर्भ में राज्यसभा सांसदों के बीच अपने विचार व्यक्त किए| इनके अलावा भारत के केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजजु भी कोलेजियम की पारदर्शिता पर संदेह व्यक्त कर चुके है|
1950 से 1973 तक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर किया जाता था| किन्तु इसकी अवहेलना के पश्चात न्यायपालिका को कुछ नियम अपनाने पड़े|
आइए देखे कोलेजियम व्यवस्था /प्रणाली क्या है तथा इसका विकास कैसे हुआ-
कोलेजियम क्या है-
कोलेजियम उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशो अथवा मुख्य न्यायाधीशो का चयन, स्थानांतरण, नियुक्ति के लिए विकसित की गई एक प्रणाली है|
कोलेजियम की आवश्यकता क्यों-
भारतीय संविधान मे उच्च (अनुच्छेद -214 से 231 तक) तथा उच्चतम (अनुच्छेद 124 से 147 तक) न्यायालयों के न्यायाधीशों के नियुक्ति किसके द्वारा की जाए सम्मिलित है, किन्तु नियुक्ति की प्रक्रिया का वर्णन संविधान में नहीं मिलता है| इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति अथवा स्थानांतरण हेतु एक प्रणाली की आवश्यकता थी|
संविधान के अनुच्छेद 124 में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। इसके तहत राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों के कुछ न्यायाधीशों से "परामर्श" करने के पश्चात् सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा।
ये परामर्श शब्द ही कोलेजियम प्रणाली मे विवाद का कारण है|
हालांकि इसी अनुच्छेद में यह भी प्रावधान है कि मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश से सलाह अवश्य ली जाएगी|
कोलेजियम का विकास-
कोलेजियम का विकास उच्चतम न्यायालय के फैसलों के माध्यम से हुआ है| जिन्हे हम I , II, III न्यायाधीश केस के नाम से जानते है|
प्रथम न्यायाधीश केस- 1981
इस केस को S.P. GUPTA न्यायाधीश मामले के नाम से जाना जाता है|
इस केस का निर्णय (1982)यह आया की उपरोक्त शब्द परामर्श का सहमति नहीं विचार का आदान-प्रदान माना गया|
(न्यायाधीश की नियुक्ति - उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है| मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति अन्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सलाह के बाद करता है| इसी तरह अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति भी होती भी होती है| मुख्य न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश का परामर्श आवश्यक है|)
इसके अलावा यह निर्धारित किया गया कि न्यायिक नियुक्तियों और स्थानांतरण पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सुझाव को ठोस कारणों से अस्वीकार किया जा सकता है|
(यहाँ ध्यान देने की बात है इस केस में सरकार का हस्तक्षेप ज्यादा हो जाता है और CJI के सुझाव का कोई मतलब ही नहीं रह जाता|)
इस केस के दौरान काही गई कुछ महत्वपूर्ण शब्द -
संविधान की व्याख्या जैसी है, न कि जैसा हम सोचते हैं कि उसे होना चाहिए। हम चाहें तो संविधान की भाषा को अपनी मर्जी से मोड़ने के लिए हमेशा कोई न कोई कारण खोज सकते हैं, लेकिन वह व्याख्या की आड़ में संविधान को फिर से लिखना होगा।
द्वितीय न्यायाधीश केस- 1993
इस केस मे न्यायालय ने अपने पूर्व के फैसले को परिवर्तित करते हुए कहा की परामर्श का मतलब सहमति प्रकट करना है|
(इस तरह यह व्यवस्था दी गई कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले मे उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दी गई सलाह राष्ट्रपति को मानने की बाध्यता होगी| किन्तु मुख्य न्यायाधीश ये सलाह अपने दो वरिष्ठतम सहयोगियों से विचार- विमर्श करने के बाद देगा|
(यहाँ ध्यान देने की बात है इस केस में CJI का हस्तक्षेप ज्यादा हो जाता है और सरकार के सुझाव का कोई मतलब ही नहीं रह जाता|)
तृतीय न्यायाधीश केस - 1998
(राष्ट्रपति ने उच्चतम न्यायालय से अनुच्छेद 143 के तहत 1993 में (द्वितीय न्यायाधीश केस- 1993) भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपनाई गई आवश्यक शर्तों के संबंध मे संवैधानिक व्यवस्था के तहत कुछ संदेह पर परामर्श मांगा|
इस मामले में न्यायालय ने मत दिया की परामर्श प्रक्रिया को मुख्य न्यायाधीश द्वारा "बहुसंख्यक न्यायाधीशों की विचार प्रक्रिया के तहत मन जाएगा| अर्थात मुख्य न्यायाधीश को चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से सलाह करनी चाहिए, इनमें से अगर दो का मत भी पक्ष में नहीं है तो वह नियुक्ति के लिए सिफारिश नहीं भेज सकता|
न्यायालय ने व्यवस्था दी की अन्य न्यायाधीशों की सलाह के बिना भेजी गई सिफारिश को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है|
सरकार कोलेजियम को अपारदर्शि और न्याय मे हो रही देरी के लिए जिम्मेदार मानती है| और न्यायपालिका में कुछ अपना प्रभुत्व भी जमाना चाहती है| इसी के मद्दे नजर साल 2014 में 99 वां संविधान संशोधन कर एक नए निकाय "राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की स्थापना की| किन्तु 2015 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 99 वां संविधान संशोधन अधिनियम तथा NJACअधिनियम दोनों को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया|
नोट- वर्तमान मे तृतीय न्यायाधीश केस के फैसले के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है|
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