लोग



 कैसे लोग जीते है? मैं सहम सा जाता इनकी चालाकियों से..

हर रोज किसी का बचपना छीन, दिल सख़्त किये जाते है।

वो  कहते कुछ और है, किये कुछ और जाते हैं...

लीबाश तो ओढ़े हैं सब, बस मेरे ही नक़ाब पर बवाल हो रखा है।

मक़ताबें हमारी, एतराज़ उनका... ये कहाँ का फ़रमान हो रखा है?

उनका लगाया इल्ज़ाम हमपे सिद्ध न होता, फिर भी कैद हमारी मंजूर हो रखा है।

उनके लहज़े में मार-पीट, अजी बड़ा अजीब है..

उसका नया फरमान ना जाने कितनों का दिल तोड़ रखा है।

झूठ उनका माने न कोई..

हमारे झूठ को गुनाह बना रखा है।

ताक में है वो हमारे लोगो को बहलाने में..

हमारे भी कुछ लोगो ने अपना ज़मीर बिकाऊ बना रखा है।

चला रखी है उन्होंने ऐसे हवाएं

हर घर उनकी अदाओं के लपेट में हैं।

लीबाश तो ओढ़े है सब, बस मेरे ही नक़ाब पे बवाल हो रखा है।





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