रह गई जो वो कसक, जज़्बातों की लौ में ज़िंदा है,
बंदा क़द्र की फ़िराक़ पाले, मदफ़न में भी ज़िंदा है।
वक़्त की गर्द ने चेहरों से कई निशां मिटा डाले,
दिल में उतरी जो मोहब्बत, आज तलक वो ज़िंदा है।
लफ़्ज़ सारे थक के बैठे, और फिर ख़ामोशी बोल उठी,
दर्द की तह में छुपी कोई, हल्की-सी खलिश ज़िंदा है।
लोग समझे ख़त्म हुआ सब, दास्ताँ दफ़्न हुई कब की,
याद की मिट्टी हटाओ तो, हर मंज़र फिर ज़िंदा है।
क़ब्र पर फूल चढ़ाने से तसल्ली मिलती होगी,
वरना सीने में जो चुभता, वो काँटा ही ज़िंदा है।
टूट कर भी जो न टूटा, वो रिश्ता अजब था शायद,
नाम मिटा दो काग़ज़ से, एहसास मगर ज़िंदा है।
जो जज़्बातों में बस जाए, वो अल्फ़ाज़ कहां मिटते हैं,
Tarif की कलम के, ये एहसास हमेशा ज़िंदा है।

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