उर्दू ज़बान

                  


यू तो उर्दू ज़बान की पैदाईश हिन्दुस्तान में हुई। 13वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक इसको हिन्दवी भाषा का ख़िताब दिया गया था। फिर धीरे-धीरे ये साम्प्रदायिक भाषा बनती गयी, आज हाल ये है कि उर्दू ज़बान ख़त्म होने के कगार पर आ खड़ी है।

अन्य भाषाओं से उर्दू को कही बेहतर और तहज़ीब की बोली/भाषा कहा गया है। उर्दू लहजे में गुस्से से बोले गए शब्द भी शहद जैसे मालूम होते है।

जैसे- आप तो निहायत की बदबख़्त इंसान है।

ख़ैर आज उर्दू की सामाजिक हालात ये हो रखी है कि मदरसा, अख़बार, उर्दू के अध्यापक सब का गुजारा बहुत मुश्किल के चल रहा है।

और इस सब के जिमेददार हम सब है। 

सब आय-दिन खबरों से रूबरू होते ही होंगे, तो सब ने पढ़ा या सुना ही होगा किस तरह से उर्दू नामो को बदला जा रहा है। मदरसों/सरकारी स्कूलों से उर्दू की किताबें ग़ायब होती जा रही है। 

तहसील और कचहरी  में काम काज ज़्यादातर उर्दू भाषा में किया जाता है लेकिन अब धीरे धीरे उसे भी बदला जा रहा है। इसका कारण है उसकी की उपयोगिता कम होना। 

किसी समाज को ख़त्म करने का सबसे अच्छा तरीका होता है उसकी संस्कृति को ख़त्म कर देना।

तो हमें अपनी संस्कृति को बचाना चाहिए उसकी उपयोगिता को बढ़ाना चाहिए| अपने बच्चों और अपने परिवार के सदस्यों के साथ बोल-चाल में उर्दू भाषा का उपयोग करना चाहिए।

बच्चों के स्कूलों में उर्दू भाषा एक विषय के रूप में पढ़ाने के लिए एक घंटी बनवानी चाहिए।

उर्दू अखबारों का उपयोग कर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए,आप रोज नहीं ले सकते तो सप्ताह में एक दिन जरूर ख़रीदे।

संदेश- लोकतंत्र, और राष्ट्र हित के लिए निडर संपादकों के अखबारों का उपयोग करे और दूसरों को भी करने की सलाह दें।


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