तय करो
मोहब्बत या जिन्दगी
किसकी कहानी सुनोगे?
तय करो
ग़म या ख़ुशी
किसे पसंद करोगे?
अगर इरादा "मोहब्बत" सुनने का है तो सुनो..
वो लगती मुझे बहुत हसीन थी, सूरत नहीं सीरत की बात है।
अभी मोहब्बत चढ़ान पर थी।
ज़िन्दगी अभी बिना उसूल थी। मगर बातें हमारी उसूल की थी।
फिर एक हादसा हुआ...
फिर हमारी जिंदगी का फैसला हुआ।
वो बिछड़ के हमसे रहे 12 साल..
मगर इंतज़ार उनका यहां हर साल था।
अब तय करो ग़म या ख़ुशी क्या सुनोगे?
अगर बात "ख़ुशी" की है तो...
उसका पता आया कही दूर बहती हवाओं के साथ,
दिल-ए-बेचैन यहाँ वर्षों से था।
फिर हमारी बात हुई, मुलाक़ात हुई, और आंखों से इकतरफ़ा इज़हार हुई।
सवाल अब "जिन्दगी" का था,
यूं तो मोहब्बत से घर चलाया नहीं जा सकता...
मैं ठहरा शायर, यहां लोग शायरी के बदले दाद देते है,
इस दाद पे किसी से वादा तो किया नहीं जा सकता...
उसके तकदीर में खुशियां मुनासिब थी, भला उसे ख़ुद जैसा कैसे बनाता।
बात अगर "ग़म" की करु तो हां उसे बेहद ग़म था मेरे ऐसे बदल जाने का...
रात चाँदनी थी और हवाओं में नामी मगर इससे कहीं ज्यादा उसके आँखों में,
उसका एक ही सवाल था पहले क्यों नहीं मिले तुम?
गला मेरा भी भर आया, मगर समझाना उसे था,
तड़प उसकी मेरे रूह से मिल जाने की हो लगा...मुझे जब इल्ज़ाम-ए-मोहब्बत उसने अपने सर रखा।
मेरी खुदगर्जी देखो... जब लगी ख़बर मुझे वो मोहब्बत किसी और का भी था,
मेरा उससे तालुक कुछ बदल सा गया।
फिर फ़िक्र-ए-मासूमियत हुई निग़ाह-ए-गैर आशिक़ के लिए...
फिर मैंने एक तरक़ीब निकली....
मेरा उसकी दुनियां से कहीं खो जाना, फिर लौट कर न आना।

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