इमाद और सिमरन -I


 

रात होने को थी और सड़के सुनसान हो रही थीं, कंधे पर बैग लटकाये एक अजनबी  गुरुद्वारे की तरफ बढ़ता जा

 रहा था, आंखे उसकी लाल और चढ़ी हुई मालूम हो रही थी..

गुरुद्वारे से एक सरदार जी बाहर निकलते हुए -

सरदार जी- जाओ पुत्तर जाओ वाहे गुरु सबकी अरदास पूरी करता है,

अजनबी गुरुद्वारे के अंदर एक कोना पकड़ कर बैठ गया, और उसे नींद लग गयी।

काफी रात गुज़र गयी...

एक सरदार जी उसके पास से बार बार गुजरे जा रहे थे, और उसे संदेह की नज़रों से देखे जा रहे थे।

(अब सुबह होने हो आयी, और अजनबी अभी भी सोया है।)

गुरुद्वारे में लोगों का आना शुरू हो गया, सभी सुमिरन में मगन थे।

आज बलवीर जी देर हो गए थे..

सरदार जी बलवीर जी के इंतज़ार में थे।

बलवीर जी जैसे ही गुरुद्वारे में दाखिल होते है, सरदार जी आहिस्ता से उनके पास आ कर बैठ जाते है।

सरदार जी- बलवीर जी आप उसे देख रहे हो?

बलवीर जी- किसे सरदार जी।

सरदार जी - वो किनारे एक अजनबी रात से सोया पड़ा है  रंग रूप से ठीक नहीं लगता हमे।

बलवीर जी- सरदार जी,होगा कोई रब का बंदा,कोई तकलीफ होगी उसे,जब उठे तब बात करते है।

सरदार जी - मगर सुमिरन का समय हो रहा, और इसे ऐसे सोता हुआ नहीं छोड़ सकते न?

बलवीर जी - अच्छा भाई जगाओ उसे..

सरदार जी - अरे भाई उठ जाओ सुबह होने आयी।

    (दो तीन बार आवाज़ लगाने पर अज़नबी की आंख खुली)

अज़नबी सरदार जी, और बलवीर जी को देख के डर गया।

बलवीर जी- डरो नहीं, हम बलवीर है और ये सरदार जी है। आप कहाँ से हो पुत्तर?

अजनबी- मम.. मैं लल्ल..लख़नऊ  उत्तर प्रदेश से हूँ,

              (डर से हकलाते हुए )

सरदार जी- आप का नाम क्या है बेटा?

अजनबी- मम्मेरा न..नम ( रुक के सोचने लगता है सच्च बोलू या नहीं फिर फैसला करता है मैंने हमेशा सच्च बोला है आज भी सच्च ही बोलूंगा..

सरदार जी - क्या हुआ बेटा? बोलो क्या नाम है।

अजनबी- इमाद 

बलवीर जी- आप मुस्लिम हो?

सरदार जी - अगल बगल देखने लगे,

इमाद- जी हाँ, मैं मुसलमान हूँ मैं यहाँ नया हूँ तो.. 

सरदार जी- तो क्या कही घुसे चल जाओगे?

बलवीर जी- सरदार जी नरम हो जाओ |

इमद - जी नहीं मेरे पास पैसे नहीं थे ताकि मैं होटल मे ठहर सकूँ|

बलवीर जी - कोई गल नहीं पुत्तर ये रब दा घर है, यहाँ सब आते है, आप चलो नाश्ता कर लो- पता नहीं रात मे कुछ खाया भी है या नहीं-

इमाद- जी खाया थोड़ी रोटी राखी थी तो -

बलवीर जी - आ पुत्तर चल मेरे घर मेरे साथ तू भी नाश्ता कर ले|

इमाद - नहीं सरदार जी मैं ठीक हूँ अभी होटल खुलेगा तो मैं कर लूँगा|

बलवीर जी - अरे पुत्तर यहाँ होटल 10 बजे से पहले नहीं खुलदा, अच्छा रहेगा मेरे साथ मेरे घर चल|

इमाद - ठीक है सरदार जी आप इतना कह रहे तो मैं आप की बात नहीं टालूँगा|

( इमाद और बलवीर दोनों घर के तरफ निकल गए बलवीर का घर गुरुद्वारे से थोड़ी दूर था और बस्ती से थोड़ा हट के था|)

बलवीर जी - इमाद पुत्तर यहाँ कोई काम से आया था?

इमाद- हाँ जी यहाँ से एक फोन आया था नौकरी के लिए, तो हम चले आए| अब कल वहाँ जाना है|

बलवीर जी- अच्छा पुत्तर ठीक है सुबह चले जाना, लेकिन बिना जाँच पड़ताल के कही जाया नहीं करते देख ही रहे हो समय कितना ख़राब हो रखा है| 

इमाद - जी सरदार जी 

बलवीर जी - पुत्तर मैंनु  सरदार जी न बोल तू मैनु बलबीर जी ही बोल-

इमाद-  जी बलवीर जी-

(बलबीर जी और इमाद दोनों घर के गेट पर पहुंचे)

बलवीर जी गेट से ही आवाज़ लगाने गले पुत्तर सिमरन बाहर आ  देख कौन आया है-

इमाद को सिमरन का नाम सुनते ही DDLJ की सिमरन याद आई-

(सिमरन दौड़ी दौड़ी किचन से बाहर आ ही रही थी की दरवाजे का पर्दा हवा से उड़ा तो इमाद उसे नज़र आया, फिर सिमरन वही रुक गयी- और खिड़की से देखने लगी वो बलबीर जी को बस बल जी बोला करती है)

सिमरन - खिड़की से बलबीर जी को देख रही थी को वो मेरी तरफ देखें, 

(फिर झटके से बलबीर जी की नज़र खिड़की पे गयी )

अभी बलबीर जी कुछ बोलने ही वाले थे की 

सिमरन- तुरंत इशारे से बलबीर जी को अन्दर आने को बोली-

बलबीर जी - इमाद पुत्तर जा वहां फ्रेश हो जा (बाथरूम की तरफ इशारा करके) अभी मैं अन्दर से हो के आता हूँ|

इमाद- जी बलबीर जी (इमाद फ्रेश होने चला गया)

बलबीर जी -हाँ पुत्तर बोल क्या बात है?

सिमरन- आप किसे घर ले आए?

(बलबीर जी सारी कहानी बताये इमाद की)

सिमरन- फिर भी अजनबियों से ज्यादा घुलते मिलते नहीं- और ये कब जायेगा?

बलबीर जी- देख पुत्तर ये जिस काम के लिए आया है वो अगर आज हो जाये तो आज ही निकल जायेगा नही तो 2-3 दिन मानले-

सिमरन- ठीक है बल जी जाओ  आप दुकान से ब्रेड लेते आओ-

बलजी- अच्छा पैसा तो दे दे पुत्तर-

(बलबीर जी की जमीन ज्यादा थी जिसपे वे अनाज के साथ- साथ सब्जियां भी उगवाया करते थें और उनका एक नौकर भी था शीमु जो वृद्ध था लेकिन काम में उसके कोई चुक नही होती वो नौकर के साथ साथ बलबीर का एक हाथ भी था| उसकी पत्नी और उसकी बेटी भी बलबीर के घर के कामों में हाथ बटाया करते थे बलबीर की बेटी और शामू की बेटी बचपन से ही एक साथ ही रहा करती थी वो दोनों बहुत अच्छी दोस्त भी थी)

सिमरन- पैसे लेकर बलबीर जी को देती और मुस्कुराते हुए- बोलती  बचे हुए पैसे मेरे पास आने चाहिए|

 बलबीर जी- जी अन्न दाता (मुस्कुराते हुए)

सिमरन- ठीक है चाय पी लेना बल जी-(कहते हुए सुबह की धुप लेने छत पर चली गयी )

इमाद - फ्रेश हो के बाहर निकल  ही रहा था की छत की रेलिंग से सिमरन को देखा|

(इमाद कुर्ता और जीन्स पहन रखा था और बाहर कुर्सी पे बैठे अपने फाइल को सही कर रहा था, तभी सिमरन  छत की आगे वाली रेलिंग पर कपड़े डालने आई, फिर दोनों ने एक दुसरे को देखा लेकिन इमाद ने सिमरन से पहले अपनी नजरें किचे कर ली सिमरन भी असहज नहीं हुयी| कुछ देर बाद बलबीर जी आये )

बलबीर जी - इमाद पुत्तर फ्रेश हो लिया?

इमाद - जी बलबीर जी

बलवीर जी- अच्छा रुक पुत्तर बैठ धुप में मैं अभी आया| ( बलबीर जी ब्रेड लेकर सिमरन को पुकारते हुए छत पे गये )सिमरन तू यहाँ है? मैं तैनू पुरे घर में ढूंडतें फिर रहा- ले पुत्तर अब जल्दी से नाश्ता तैयार कर दे उसे देर हो जाएगी- 

सिमरन- बस एक मिनट बल जी थोड़े ही कपड़े है इन्हें फैला कर जा रही हूँ|

(इमाद सिमरन और बलबीर की बातें बाहर बैठे बैठे सुन रहा था|)

बलबीर जी- ला दे पुत्तर मैं किये देता हूँ(सिमरन के हाथों से कपड़े छिनते हुए)

सिमरन- बल जी आप जाओ बात करो मैं अभी तैयार कर के लाती हूँ नाश्ता 

बलबीर जी- तू भी जा पुत्तर, वख्त देख, (बलबीर जी सिमरन से कपडे लेकर खुद फ़ैलाने लगे|)

इमाद- बलबीर जी को देख के मुस्कुराने लगा तो बलबीर जी भी मुस्कुराये-

(सिमरन किचन में नाश्ता तैयार कर रही थी की तभी उसकी सहेली हर्गीत (शीमु की बेटी) पीछे के दरवाजे से आई|

हर्गीत - सिमरन को चुपके से आके टच की सिमरन दर से चिल्ला उठी| (हर्गीत सिमरन का मुहं बंद कर दी की कही उसे डाट न पड़े)

बलबीर जी - छत से दौड़े -दौड़े क्या हुआ पुत्तर?

सिमरन- कुछ नहीं बलजी हर्गीत है|

बलबीर जी - अरे हर्गीत ऐसे न डराया कर दिल बैठ सा जाता है पुत्तर|

हर्गीत- ठीक है ताऊ जी अब से ना करुँगी|

(बलबीर जी इमाद के पास जा कर बैठ के बातें करने लगे)

हर्गीत- तू तो कामिनी मुझे डांट सुनवाई होती ताऊ जी से-

सिमरन- हाँ तो तू ऐसी हरकते न किया कर-

हर्गीत- वैसे आज तेरी रसोई इतनी जल्दी कैसे शुरू हो गयी? रात में कुछ खाया नही था क्या?

सिमरन- वो जा देख बाहर -

हर्गीत- क्या?

सिमरन- अरे जा न देख के आ-

हर्गीत- बाहर सोचते हुए जाती और देखते हुए (क्या है बाहर)

(इमाद बलबीर जी के शरीर से हर्गीत को दिख नही रहा था  वो सीधे बलबीर जी के पास पहुँच गयी)

हर्गीत- ताऊ जी बा....... हर...

(हर्गीत को अचानक से इमाद दिख गया तो वो चुप हो गयी)

बलबीर जी- अरे हर्गीत पुत्तर..  (बलबीर जी हर्गीत और इमाद का परिचय करते हुए)- इमाद ये हर्गीत सिमरन की सहेली, और हर्गीत ये इमाद है कुछ काम से यहाँ आये हुए है-

इमाद -  नमस्ते-

हर्गीत- मुस्कुराते हुए- जी नमस्ते 

बलबीर जी- पुत्तर देख जरा नाश्ता तैयार हो गया  है तो इमाद पुत्तर के लिए ला|

हर्गीत- जी ताऊ जी अभी लाती हूँ |

बलबीर जी- इमाद चल पुत्तर बरामदे में-

हर्गीत- नाश्ता परोसने लगी और इमाद और बलबीर जी नाश्ता करने लगे|








 






    

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